“मधुर मधुर मेरे दीपक जल” Class 10 Hindi Lesson Explanation, Summary, Question Answers

‘मधुर मधुर मेरे दीपक जल’ Explanation, Summary, Question and Answers and Difficult word meaning

मधुर मधुर मेरे दीपक जल – CBSE Class 10 Hindi Lesson summary with detailed explanation of the lesson ‘Madhur Madhur Mere Deepak Jal’ by Bihari along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary and all the exercises, Question and Answers given at the back of the lesson

कक्षा 10 हिंदी पाठ 6 मधुर मधुर मेरे दीपक जल (कविता )

madhur

कवयित्री परिचय

कवयित्री – महादेवी वर्मा
जन्म – 1907 (उत्तरप्रदेश – फर्रुखाबाद )
मृत्यु – 11 सितम्बर 1987

 

पाठ परिचय

दूसरों से बातें करना,दूसरों को समझाना ,दूसरों को सही रास्ता दिखाना ऐसे काम तो सब करते हैं। कोई आसानी से कर लेता है ,कोई थोड़ी कठिनाई उठा कर ,कोई थोड़ी झिझक और संकोच के बाद और कोई किसी तीसरे का सहारा ले कर करता है। लेकिन इससे कहीं ज्यादा परिश्रम का काम होता है आपने आप को समझाना। अपने आप से बात करना ,अपने आप को सही रास्ते पर बनाये रखने की कोशिश करना।  अपने आपको हर परिस्थिति में ढालने के लिए तैयार रखना ,हर स्थिति में सावधान रहना और अपने आपको को चैतन्य बनाये रखना।

प्रस्तुत पाठ में कवयित्री आपने आप से जो उम्मीदें कर रही है , अगर वो उम्मीदें पूरी हो जाती हैं तो न केवल उसका , हम सभी का बहुत भला हो सकता है। क्योंकि हम शरीर से भले ही अनेक हों किन्तु प्रकृति ने हम  सब को एक मनुष्य जाति के रूप में बनाया है।

 

पाठ व्याख्या

मधुर मधुर मेरे दीपक जल

युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल,
      प्रियतम का पथ आलोकित कर।

प्रतिक्षण – हर घडी
प्रतिपल – हर पल
प्रियतम – आराध्य , ईश्वर
आलोकित – प्रकाशित

प्रसंग -: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श  भाग -2 ‘ से ली गई है। इन पंक्तियों की कवयित्री महादेवी वर्मा है। इन पंक्तियों में कवयित्री मन के दीपक को जला कर दूसरों को रह दिखने की प्रेरणा दे रही है।

व्याख्या -: कवयित्री कहती हैं कि मेरे मन के दीपक (ईश्वर के प्रति आस्था) तू मधुरता और कोमलता से जलता जा और हर पल ,हर घडी ,हर दिन और युगो -युगो तक मेरे आराध्य अथवा ईश्वर का या ज्ञान का रास्ता प्रकाशित करता जा अर्थात ईश्वर में आस्था बनी रहे।

 

सौरभ फैला विपुल धूप बन,
मृदुल मोम सा घुल रे मृदु तन;
दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल गल
पुलक पुलक मेरे दीपक जल।

सौरभ – सुगंध
विपुल – विस्तृत
मृदुल – कोमल
अपरिमित – असीमित ,अपार
पुलक – रोमांच

प्रसंग -: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श  भाग -2 ‘ से ली गई है। इन पंक्तियों की कवयित्री महादेवी वर्मा है। इन पंक्तियों में कवयित्री अपने मन के दीपक को अनन्त रौशनी (ज्ञान) फैलाने को प्रेरित कर रही हैं।

व्याख्या -: कवयित्री कहती हैं कि मेरे मन के दीपक, तू अपनी सुगंध को अर्थात अपनी अच्छाई को इस तरह फैला जैसे एक धुप या अगरबत्ती अपनी खुशबु को फैलाते  हैं। अपने स्वच्छ शरीर के सहारे अपनी  कोमल मोम को इस तरह से पिघला दे कि तेरे प्रकाश की कोई सीमा ही न रहे और इस तरह जल की तेरे शरीर का एक – एक अणु उसमें समा कर प्रकाश को फैलाए अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि अज्ञान का अँधेरा बहुत गहरा होता है ।अतः इसे दूर करने के लिए तन मन दोनों निछावर करने होते हैं। कवयित्री कहती हैं कि मेरे मन के दीप तू सब को रोमांचित करता हुआ जलता जा।

 

सारे शीतल कोमल नूतन,
माँग रहे तुझसे ज्वाला कण
           विश्व शलभ सिर धुन कहता ‘मैं 
           हाय न जल पाया तुझमें मिल।
सिहर सिहर मेरे दीपक जल।

नूतन – नया

ज्वाला कण – आग की लपट

शलभ – पतंगा

सिर धुन – पछताना

सिहर – कांपना

प्रसंग -: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श  भाग -2 ‘ से ली गई है। इन पंक्तियों की कवयित्री महादेवी वर्मा है। इन पंक्तियों में कवयित्री दीपक को इस तरह से जलने को कहती है कि सबको बराबर प्रकाश मिले और किसी को उस प्रकाश से हानि ना हो।

व्याख्या -: कवयित्री कहती हैं कि कि मेरे मन के दीपक तू इस तरह से जल कि सभी ठण्डे , मुलायम और नए तुझसे तेरी आग के कुछ कण मांगे अर्थात सभी जिसे भी ज्ञान की जरुरत हो वो तेरे  पास आये। तू उन्हें ऐसा प्रकाश दे या ऐसा ज्ञान दे कि वो कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहे। पतंगे पछताते हुए कहें कि वो तेरी आग में समा कर क्यों नहीं जले अर्थात सांसारिक लोग भी तेरी तरह बनना चाहें अर्थात ज्ञान इतना होना चाहिए की सबके काम आ सके और कोई उसमे जल कर भस्म ना हो जाये। इसलिए कवयित्री कहती है कि दीपक तू कंपते हुए इस तरह जल की तेरा प्रभाव सब पर पड़े अर्थात सब अपनी जरुरत और क्षमता के हिसाब से प्रकाश या ज्ञान ले सकें।

 

जलते नभ में देख असंख्यक,
स्नेहहीन नित कितने दीपक;
              जलमय सागर का उर जलता,
              विद्युत ले घिरता है बादल।
विहँस विहँस मेरे दीपक जल।

असंख्यक – अनेक
स्नेहहीन – प्रेम से रहित
उर – ह्रदय
विद्युत – बिजली
विहँस – भलाई

प्रसंग -: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श  भाग -2 ‘ से ली गई है। इन पंक्तियों की कवयित्री महादेवी वर्मा है। इन पंक्तियों में कवयित्री अपने मन के दीपक को सबकी भलाई करते हुए आगे बढ़ने को कह रही हैं।

व्याख्या -: कवयित्री कहती हैं कि आकाश में जलते हुए अनेक तारे तो हैं परन्तु उनमें दीपक की तरह प्रेम नहीं है क्योंकि उनके पास प्रकाश तो है परन्तु वे दुनिया को प्रकाशित नहीं कर सकते। वहीँ दूसरी ओर जल से भरा सागर अपने हृदय को जलाता रहता है क्योंकि उसके पास इतना पानी होने के बावजूद भी वह पानी किसी के काम का नहीं है और बादल बिजली की सहायता से पूरी दुनिया पर बारिश करता है।  उसी तरह कवयित्री कहती है कि मेरे मन के दीपक तू भी अपनी नहीं दूसरों की भलाई करता जा।

 

पाठ सार

इस कविता के माध्यम से कवयित्री कहती हैं कि मेरे मन के दीपक (ईश्वर के प्रति आस्था) तू मधुरता और कोमलता से ज्ञान का रास्ता प्रकाशित करता जा। अपनी सुगंध को अर्थात अपनी अच्छाई को इस तरह फैला जैसे एक धुप या अगरबत्ती अपनी खुशबु को फैलाते  हैं। तेरे प्रकाश की कोई सीमा ही न रहे और इस तरह जल की तेरे शरीर का एक – एक अणु उसमें समा कर प्रकाश को फैलाए अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि अज्ञान का अँधेरा बहुत गहरा होता है अतः इसे दूर करने के लिए तन मन दोनों निछावर करने होते हैं।

madhur

कवयित्री कहती हैं कि मेरे मन के दीप तू सब को रोमांचित करता हुआ जलता जा। इस तरह से जल कि सभी तुझसे तेरी आग के कुछ कण मांगे अर्थात सभी जिसे भी ज्ञान की जरुरत हो वो तेरे  पास आये। तू उन्हें ऐसा प्रकाश दे या ऐसा ज्ञान दे कि वो कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहे। ज्ञान इतना होना चाहिए की सबके काम आ सके और कोई उसमे जल कर भस्म ना हो जाये। इसलिए कवयित्री कहती है कि  दीपक तू कंपते हुए इस तरह जल की तेरा प्रभाव सब पर पड़े। कवयित्री कहती हैं कि आकाश में जलते हुए अनेक तारे तो हैं परन्तु उनमें दीपक की तरह प्रेम नहीं है क्योंकि उनके पास प्रकाश तो है परन्तु वे दुनिया को प्रकाशित नहीं कर सकते। वहीँ दूसरी ओर जल से भरा सागर अपने हृदय को जलाता रहता है क्योंकि उसके पास इतना पानी होने के बावजूद भी वह पानी किसी के काम का नहीं है और बादल बिजली की सहायता से पूरी दुनिया पर बारिश करता है उसी तरह कवयित्री कहती है कि मेरे मन के दीपक तू भी अपनी नहीं दूसरों की भलाई करता जा।

 

प्रश्न अभ्यास

(क ) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1 -: प्रस्तुत कविता में ‘दीपक ‘ और ‘प्रियतम ‘ किसके प्रतिक हैं ?

उत्तर -: प्रस्तुत कविता में ‘दीपक ‘ ईश्वर के प्रति आस्था का और ‘प्रियतम ‘ उसके आराध्य ईश्वर का प्रतिक है।

 

प्रश्न 2 -: दीपक से किस बात का आग्रह किया जा रहा है और क्यों ?

उत्तर -: कवयित्री ने दीपक को निरंतर जलने के लिए इसलिए कहा है क्योंकि जब दीपक निरंतर जलेगा तो उसके आराध्य अर्थात ईश्वर तक जाने का ज्ञान रूपी रास्ता हमेशा प्रकाशमान रहेगा।

प्रश्न 3 -: ‘विश्व – शलभ’ दीपक के साथ क्यों जल जाना चाहता है ?

उत्तर -: विश्व – शलभ दीपक के साथ अपने आपको मिलाकर प्रकाशमय होना चाहता है। जिस तरह दीपक अपने आपको जला कर ज्ञान रूपी प्रकाश फैलता है पतंगा भी उसी के साथ मिलकर ज्ञान रूपी प्रकाश फैलाना चाहता है।

 

प्रश्न 4 -: आपकी दृष्टि में मधुर मधुर मेरे दीप जल कविता का सौंदर्य इन में से किस पर निर्भर करता है ?
             (क ) शब्दों की आवृति पर

 

              (ख) सफल बिंब अंकन पर

उत्तर -: इस कविता में सौंदर्य दोनों पर निर्भर है। पुनरुक्ति रूप में शब्द का प्रयोग है – मधुर मधुर, युग युग, गल गल,पुलक पुलक, सिहर सिहर, विहँस विहँस आदि कविता को लयबद्ध बनाते हुए प्रभावी बना रहे हैं। दूसरी ओर  बिम्ब योजना भी सफल है – विश्व शलभ सिर धुन कहता, मृदुल मोम सा घुल रे मृदु तन जैसे बिम्ब हैं।

 

प्रश्न 5 -: कवयित्री किसका पथ आलोकित करना चाह रही है?

उत्तर -: कवयित्री अपने प्रियतम अर्थात ईश्वर का पथ आलोकित करना चाह रही है।

 

प्रश्न 6 -: कवयित्री को आकाश में तारे स्नेहहीन से क्यों  प्रतीत हो रहें हैं ?

उत्तर -: कवयित्री को आकाश में तारे स्नेहहीन से प्रतीत हो रहे है क्योंकि उनमे प्रकाश तो है परन्तु वे दूसरों को प्रकाशित नहीं कर पा रहे हैं।

 

प्रश्न 7 -: पतंगा अपने क्षोभ को किस प्रकार व्यक्त कर रहा है ?

उत्तर -: पतंगा पछ्ता कर अपना क्षोभ व्यक्त कर रहा है। वह सोचता है कि वह उस दीपक के साथ ही क्यों नहीं जल गया क्योकि पतंगा दीपक के साथ जल कर ज्ञान रूपी प्रकाश फैलाना चाहता था।

 

प्रश्न 8 -: मधुर मधुर ,पुलक पुलक ,सिहर सिहर और विहँस विहँस कवयित्री ने दीपक को हर बार अलग अलग तरह से जलने को क्यों कहा है ?स्पष्ट कीजिए।

उत्तर -: कवयित्री अपने मन रूपी दीपक को मधुरता , कंपन , रोमांच और ख़ुशी हर परिस्थिति में जलने के लिए कहा है ताकि हर परिस्थिति में कवयित्री अपने आराध्य अर्थात ईश्वर के मार्ग को प्रकाशमान बनाये रखे।

 

प्रश्न 9 -: निचे दी गई काव्य – पंक्तियों को पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए -:
जलते नभ में देख असंख्यक,
स्नेहहीन नित कितने दीपक;
             जलमय सागर का उर जलता,
             विद्युत ले घिरता है बादल।
विहँस विहँस मेरे दीपक जल।
(क ) स्नेहहीन दीपक से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर -: स्नेहहीन दीपक से तात्पर्य उन व्यक्तिओं से है जो दूसरों के लिए कुछ भी नहीं कर सकते।

 

(ख ) सागर को जलमय कहने से क्या अभिप्राय है और उसका ह्रदय क्यों जलता है ?

उत्तर -: सागर के पास भरपूर पानी होने के बाद भी वह पानी किसी काम नहीं आता लेकिन बादल के पास जितना भी पानी होता है वो संसार पर बरसा देता है यह देख कर   सागर का हृदय जलता है।

 

(ग ) बादलों की क्या विशेषता बताई गई है ?

उत्तर -: बादलों में जल भरा होता है वो इस जल को संसार पर बरसा कर संसार को हरा भरा करते हैं और बिजली की चमक से संसार को प्रकाशमान करते हैं अतः बादल का स्वभाव परोपकारी कहा गया है।

 

(घ ) कवयित्री दीपक को विहँस विहँस कर जलने को क्यों कह रही है ?

उत्तर -: कवयित्री दीपक को सबकी भलाई करते हुए जलने को इसलिए कहती है क्योंकि उसने देखा है कि सागर भरपूर पानी के बाद भी किसी की प्यास नहीं भुजा सकता और बादल थोड़े से पानी से सबको खुश कर देता है तो कवयित्री भी चाहती है की वो सागर ना बन कर बादल बने और सबकी भलाई करे।

 

प्रश्न 10 -: क्या मीराबाई और आधुनिक मीरा महादेवी वर्मा इन दोनों ने अपने अपने आराध्य देव से मिलने के लिए जो युक्तियाँ अपनाई हैं ,उनमे आपको कुछ समानता या अंतर प्रतीत होता है ? अपने विचार प्रकट कीजिए।

उत्तर -: महादेवी वर्मा ने ईश्वर को निराकार ब्रम्ह माना है और उसी को अपना अराध्य भी मानती हैं। सबकुछ समर्पित करने की इच्छा भी की है परन्तु उसके स्वरूप का वर्णन नहीं किया है। मीरा कृष्ण को अपना प्रियतम मानती है और उनकी सेविका बनना चाहती हैं। उनके स्वरूप और सौन्दर्य की रचना भी की है। इन दोनों में बस इतना ही फर्क है कि महादेवी अपने अराध्य को निर्गुण मानती है और मीरा अपने प्रियतम की सगुण उपासक है।

 

(ख ) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए –

(1)-: दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित,
    तेरे जीवन का अणु गल गल
उत्तर -: कवयित्री का मानना है की मेरे आस्था के दीपक तू जल जल कर अपने जीवन के एक – एक कण को गला दे और उस प्रकाश को सागर की भांति फैला दे। ताकि दूसरे लोग भी उसका लाभ उठा सकें।

 

(2)-: युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल,
    प्रियतम का पथ आलोकित कर।

उत्तर -: कवयित्री का भाव यह है कि आस्था रूपी दीपक जलता रहे और युगों – युगों तक प्रकाश फैलाता रहे ताकि प्रियतम रूपी ईश्वर का मार्ग हमेशा प्रकाशित रहे अर्थात ईश्वर में आस्था बनी रहे।

 

(3)-: मृदुल मोम सा घुल रे मृदु तन;

उत्तर -: इस पंक्ति में कवयित्री का मानना है कि इस कोमल तन को मोम की तरह पिघलना होगा ताकि प्रियतम तक पहुंचना संभव हो अर्थात ईश्वर प्राप्ति के लिए कठिन साधना करनी पड़ती है।

 

 

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